Class 10 Hindi Sakhi Question Answer | Class 10 Hindi Chapter 1 NCERT Solutions

कक्षा 10 हिंदी – साखी (कबीर) – NCERT Solutions

📚 साखी – कबीर दास

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श – NCERT Solutions

(क) प्रश्नों के उत्तर
1 मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता कैसे प्राप्त होती है?

मीठी वाणी बोलने से औरों को सुख और अपने तन को शीतलता इस प्रकार प्राप्त होती है:

औरों को सुख: जब हम मधुर और कोमल वाणी में बोलते हैं तो सुनने वाले का मन प्रसन्न हो जाता है। मीठे बोल सुनकर दूसरे व्यक्ति के मन में सकारात्मक भाव आते हैं और वे खुश हो जाते हैं।

अपने तन को शीतलता: मीठा बोलने से हमारे मन में अहंकार, क्रोध और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाएं समाप्त हो जाती हैं। जब मन शांत और निर्मल होता है तो शरीर में भी शीतलता का अनुभव होता है। मीठी वाणी से दूसरों का आशीर्वाद मिलता है जो हमें आंतरिक शांति प्रदान करता है।

2 दीपक दिखाई देने पर अँधियारा कैसे मिट जाता है? साखी के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

दीपक जलते ही अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है। कबीर ने इस उदाहरण का प्रयोग आध्यात्मिक संदर्भ में किया है:

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥

अंधकार का प्रतीक: अज्ञान, अहंकार और भ्रम

दीपक का प्रतीक: ज्ञान और ईश्वर का बोध

जब व्यक्ति के मन में अहंकार (मैं) होता है तो वह ईश्वर को नहीं देख पाता। लेकिन जब ज्ञान रूपी दीपक जल उठता है और अहंकार समाप्त हो जाता है, तब ईश्वर का साक्षात्कार होता है। ज्ञान प्राप्त होते ही जीवन का सारा अज्ञान रूपी अंधकार मिट जाता है।

3 ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, पर हम उसे क्यों नहीं देख पाते?

ईश्वर कण-कण में व्याप्त है परंतु हम उसे नहीं देख पाते क्योंकि:

कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥

1. बाहरी खोज: हम ईश्वर को बाहर खोजते हैं जबकि वह हमारे भीतर ही विद्यमान है। ठीक उसी प्रकार जैसे कस्तूरी मृग अपनी नाभि में बसी कस्तूरी की सुगंध को जंगल में ढूंढता फिरता है।

2. अज्ञानता: हमें यह ज्ञान ही नहीं है कि ईश्वर हमारे भीतर है। हम मंदिर, मस्जिद आदि में उसे खोजते रहते हैं।

3. अहंकार: जब तक मन में ‘मैं’ का भाव है, तब तक ईश्वर का साक्षात्कार नहीं हो सकता।

4. भौतिकता: हम बाहरी दिखावे में उलझे रहते हैं और आंतरिक चेतना को नहीं पहचान पाते।

4 संसार में सुखी व्यक्ति कौन है और दुखी कौन? यहाँ ‘सोना’ और ‘जागना’ किसके प्रतीक हैं? इसका प्रयोग यहाँ क्यों किया गया है? स्पष्ट कीजिए।
सुखिया सब संसार है, खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥

सुखी व्यक्ति: सामान्य लोग जो भौतिक सुखों में लिप्त हैं, खाते-पीते और सोते रहते हैं। वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य से अनजान हैं।

दुखी व्यक्ति: कबीर जैसे संत जो ईश्वर की खोज में लगे रहते हैं और ईश्वर से विरह की पीड़ा सहते हैं।

‘सोना’ का प्रतीक: अज्ञानता, मोह-माया में लिप्त रहना, आध्यात्मिक निद्रा

‘जागना’ का प्रतीक: जागरूकता, ज्ञान, आध्यात्मिक चेतना, ईश्वर की खोज में सजग रहना

प्रयोग का कारण: कबीर ने इन प्रतीकों का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया है कि सांसारिक लोग आध्यात्मिक दृष्टि से ‘सोए’ हुए हैं। वे जीवन के वास्तविक उद्देश्य से अनजान हैं। जबकि संत ‘जागे’ हुए हैं – वे जीवन की सच्चाई को जानते हैं और ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

5 अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए कबीर ने क्या उपाय सुझाया है?
निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबन पाँणीं बिना, निरमल करै सुभाइ॥

कबीर ने अपने स्वभाव को निर्मल रखने के लिए एक अनूठा उपाय सुझाया है:

निंदक को पास रखना: जो व्यक्ति हमारी निंदा करता है, उसे अपने निकट रखना चाहिए। उसे अपने आंगन में कुटिया बनाकर बसा देना चाहिए।

कारण:

  • निंदक हमारी बुराइयाँ बताता है जिससे हमें अपनी कमियों का पता चलता है।
  • वह बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल कर देता है।
  • निंदा सुनकर हमारा अहंकार समाप्त होता है।
  • हम अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करते हैं।
  • इससे हमारा चरित्र और व्यवहार सुधरता है।

यह कबीर की विनम्रता और सहनशीलता का परिचायक है।

6 ‘ऐसैं अक्षर प्रीव का, पढ़ै सु पंडित होइ’ – इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐसैं अक्षर प्रीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥

भाव:

बड़ी-बड़ी पुस्तकों को पढ़-पढ़कर संसार के लोग मर गए परंतु कोई भी सच्चा विद्वान (पंडित) नहीं बन सका। केवल किताबी ज्ञान से कोई ज्ञानी नहीं बन सकता।

प्रेम के ऐसे अक्षर हैं कि जो उन्हें पढ़ लेता है अर्थात जो ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और भक्ति रखता है, वही सच्चा पंडित (ज्ञानी) होता है।

संदेश: कबीर कहना चाहते हैं कि शास्त्रीय ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है अनुभव ज्ञान और ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम। सच्ची विद्वता प्रेम और भक्ति में है, न कि केवल पुस्तकों के अध्ययन में।
📝 भाषा अध्ययन
1 निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए
पाठ में शब्द प्रचलित रूप
जिवै जीना
औरन औरों को / दूसरों को
माँहि में
देख्या देखा
भुवंगम भुजंग / सर्प / साँप
नेड़ा निकट / पास
आँगणि आँगन
साबन साबुन
मुवा मरा / मर गया
प्रीव प्रिय / प्रेम
जालौं जलाऊँ
तास उसका / उस

💡 कबीर की मुख्य शिक्षाएँ:

  • मीठी वाणी बोलें और अहंकार त्यागें
  • ईश्वर हर जगह है, बाहर नहीं भीतर खोजें
  • निंदा को सकारात्मक रूप से लें
  • किताबी ज्ञान से अधिक प्रेम और अनुभव महत्वपूर्ण है
  • आध्यात्मिक जागरूकता अनिवार्य है
ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ऐसैं अक्षर प्रीव का, पढ़ै सु पंडित होइ॥

इस पंक्ति द्वारा कबीर यह कहना चाहते हैं:

1. शास्त्रीय ज्ञान की सीमा: बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर लोग मर गए परंतु कोई सच्चा पंडित (ज्ञानी) नहीं बन सका। केवल किताबी ज्ञान से कोई विद्वान नहीं बन सकता।

2. प्रेम का महत्व: ‘प्रीव’ अर्थात प्रेम के अक्षर को जो पढ़ता है, वही सच्चा पंडित होता है। यहाँ ‘प्रेम’ से तात्पर्य ईश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति से है।

3. अनुभव ज्ञान: सच्चा ज्ञान प्रेम, भक्ति और अनुभव से प्राप्त होता है, न कि केवल पुस्तकों से।

4. व्यावहारिक ज्ञान: जो व्यक्ति प्रेम का पाठ सीख लेता है, जीवन में प्रेम का व्यवहार करता है, वही सच्चा ज्ञानी है।

संदेश: कबीर कहना चाहते हैं कि बाहरी ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक ज्ञान और ईश्वर के प्रति प्रेम।
7 कबीर की उद्धृत साखियों की भाषा की विशेषता स्पष्ट कीजिए।

कबीर की साखियों की भाषा की प्रमुख विशेषताएं:

1. पंचमेल खिचड़ी/सधुक्कड़ी: कबीर की भाषा में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी और खड़ी बोली के शब्दों का मिश्रण है। जैसे – ‘माँहि’ (राजस्थानी), ‘नाँहिं’ (अवधी)।

2. सरल और सहज: भाषा अत्यंत सरल है जिसे आम जनता आसानी से समझ सकती है।

3. लोकभाषा: तत्सम शब्दों के स्थान पर तद्भव शब्दों का प्रयोग – जैसे ‘अक्षर’ की जगह ‘अखर’, ‘नेड़ा’ (निकट)।

4. प्रतीकात्मक: कस्तूरी, मृग, दीपक, अंधियारा आदि प्रतीकों का सुंदर प्रयोग।

5. दोहा छंद: सभी साखियाँ दोहा छंद में हैं (13-11 मात्राओं का विश्राम)।

6. मुहावरेदार: ‘घर जालौं’, ‘मुरड़ा हाथ’ जैसे मुहावरों का प्रयोग।

7. गूढ़ार्थता: सरल भाषा में गहरे आध्यात्मिक भाव।

8. जनभाषा: पूर्वी उत्तर प्रदेश की जनता की भाषा का प्रयोग।

(ख) भाव स्पष्ट कीजिए
1 बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होइ॥

भाव:

ईश्वर का विरह सर्प के समान है जो शरीर में बस जाता है। इस विरह रूपी सर्प के काटे हुए को कोई मंत्र भी ठीक नहीं कर सकता। ईश्वर से बिछुड़ा हुआ भक्त जीवित नहीं रह सकता और यदि किसी प्रकार जीवित रह भी गया तो वह पागल हो जाता है।

कबीर कहना चाहते हैं कि ईश्वर के वियोग की पीड़ा असहनीय है। यह सांप के डंक से भी अधिक कष्टदायक है। जिसे एक बार ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है, उसके बाद वियोग की स्थिति में जीना बहुत कठिन हो जाता है।

2 कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहिं॥

भाव:

कस्तूरी मृग की नाभि में रहती है परंतु मृग उसकी सुगंध से आकर्षित होकर उसे जंगल में बाहर खोजता फिरता है। उसे यह पता नहीं होता कि वह सुगंध उसके अपने शरीर से आ रही है।

इसी प्रकार ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में, कण-कण में विद्यमान है, परंतु संसार उसे बाहर मंदिर-मस्जिद में खोजता रहता है। लोग यह नहीं समझते कि ईश्वर तो उनके भीतर ही है।

संदेश: ईश्वर को बाहरी पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि अपने भीतर आत्म-चिंतन द्वारा खोजना चाहिए।
3 जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥

भाव:

जब मेरे मन में अहंकार (मैं का भाव) था, तब मुझे ईश्वर का अनुभव नहीं हो रहा था। अब जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ है तो मेरा अहंकार (मैं) समाप्त हो गया है।

जब मैंने अपने भीतर ज्ञान रूपी दीपक को जलते देखा, तब अज्ञान का सारा अंधकार मिट गया। अहंकार और ज्ञान एक साथ नहीं रह सकते, जैसे दीपक और अंधकार एक साथ नहीं रह सकते।

संदेश: ईश्वर की प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग आवश्यक है। आत्म-ज्ञान ही अज्ञान के अंधकार को दूर करता है।
4 पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
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