Class 10 Hindi Chapter 3 NCERT Solutions And Important MCQ | Manushyata Class 10 Hindi
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
कवि ने उस मृत्यु को सुमृत्यु (अच्छी मृत्यु) कहा है जो निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त हो:
1. यादगार मृत्यु: ऐसी मृत्यु जिसे सभी लोग याद रखें। जब व्यक्ति दूसरों के हित के लिए अपना जीवन समर्पित करके मरे।
2. परोपकारी जीवन के बाद:
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है और अपने लिए ही मरता है, उसकी मृत्यु व्यर्थ है। सुमृत्यु वह है जो दूसरों के लिए जीने और मरने के बाद हो।
3. मनुष्य के लिए मरना:
4. त्याग और बलिदान: जिस प्रकार रंतिदेव, दधीचि, उशीनर और कर्ण ने दूसरों के हित के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया, वैसी मृत्यु सुमृत्यु है।
उदार व्यक्ति की पहचान निम्नलिखित गुणों से होती है:
1. सरस्वती का गुणगान:
ज्ञान की देवी सरस्वती उसी उदार व्यक्ति की कथा का वर्णन करती हैं।
2. धरती का आभार:
पृथ्वी स्वयं को धन्य मानती है कि उस पर ऐसे उदार व्यक्ति का जन्म हुआ।
3. जीवित कीर्ति:
उसका यश सदैव जीवित रहता है और मधुर ध्वनि करता है।
4. सृष्टि का सम्मान:
संपूर्ण सृष्टि उस उदार व्यक्ति की पूजा करती है।
5. अखंड आत्म भाव:
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
जिसमें संपूर्ण विश्व के प्रति एकात्मकता का भाव हो, जो सभी को अपना समझे।
6. परोपकार: जो दूसरों के हित के लिए सर्वस्व त्याग कर दे।
कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों के उदाहरण देकर निम्नलिखित संदेश दिया है:
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
महान व्यक्तियों के उदाहरण:
1. रंतिदेव: अत्यंत भूखे होने पर भी अपने हाथ में पकड़ा हुआ थाल (भोजन) किसी याचक को दे दिया।
2. दधीचि ऋषि: देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियाँ दान कर दीं, जिनसे इंद्र का वज्र बनाया गया।
3. उशीनर (राजा शिबि): कबूतर की रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया।
4. कर्ण: दान के लिए प्रसिद्ध, अपने शरीर का कवच-कुंडल तक दान कर दिया।
संदेश:
- शरीर नश्वर है: यह नश्वर शरीर किसी दिन नष्ट हो ही जाएगा, इसलिए इसे परोपकार में लगाना चाहिए।
- आत्मा अमर है: अनित्य देह के लिए अनादि जीव (आत्मा) को क्या डरना?
- त्याग और बलिदान: सच्ची मनुष्यता इसी में है कि हम दूसरों के लिए त्याग और बलिदान करें।
- परोपकार सर्वोपरि: अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई करना ही मनुष्यता है।
- अमर यश: ऐसे त्याग से व्यक्ति युगों-युगों तक अमर हो जाता है।
कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में गर्व-रहित जीवन व्यतीत करने का संदेश दिया है:
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
भावार्थ:
1. धन का घमंड नहीं करना: भूलकर भी तुच्छ धन-संपत्ति के मद में अंधे नहीं होना चाहिए। धन नश्वर है और इस पर गर्व करना मूर्खता है।
2. अपने को सनाथ जानकर गर्व न करें: अपने आप को किसी का आश्रय पाया हुआ या किसी के सहारे वाला समझकर मन में घमंड नहीं करना चाहिए।
3. ईश्वर सबके साथ है: इस संसार में कोई अनाथ नहीं है क्योंकि त्रिलोकनाथ (तीनों लोकों के स्वामी) ईश्वर सभी के साथ हैं।
4. दीनबंधु के विशाल हाथ: दयालु ईश्वर दीनों के बंधु हैं और उनके हाथ बहुत विशाल हैं। वे सभी की रक्षा करते हैं।
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
‘मनुष्य मात्र बंधु है’ का अर्थ:
1. सार्वभौमिक बंधुत्व: प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य का भाई/बंधु है। सभी मनुष्य परस्पर भाई-भाई हैं। जाति, धर्म, रंग, देश की सीमाओं से परे सभी मनुष्य एक हैं।
2. एक ही पिता की संतान:
- पुराणपुरुष (प्राचीन पुरुष) परमात्मा ही सबका पिता है
- स्वयंभू (स्वयं उत्पन्न) ईश्वर सभी का जनक है
- जब सभी का पिता एक है तो सभी मनुष्य भाई-भाई हुए
3. बाहरी भेद, आंतरिक एकता:
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
- कर्मों के अनुसार बाहरी भेद हो सकते हैं (अमीर-गरीब, राजा-रंक)
- लेकिन आत्मा की एकता में सभी समान हैं
- वेद इस बात के प्रमाण हैं कि सभी की आत्मा एक ही परमात्मा का अंश है
4. बंधु की व्यथा हरना:
यह अनुचित है कि बंधु अपने बंधु की पीड़ा को दूर न करे। मनुष्य को मनुष्य का दुख-दर्द दूर करना चाहिए।
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
तवर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा निम्नलिखित कारणों से दी है:
1. विपत्तियों का सामना: जब सभी लोग एकजुट होकर चलते हैं तो विपत्तियाँ और विघ्न आसानी से दूर हो जाते हैं। अकेला व्यक्ति कमजोर होता है, लेकिन संगठन में शक्ति है।
2. प्रगति और विकास:
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
एक-दूसरे का सहारा लेकर सभी को आगे बढ़ना चाहिए और देवताओं की गोद में कलंक-रहित होकर पहुँचना चाहिए।
3. मेल-मिलाप बनाए रखना: एकता में रहने से आपसी प्रेम और सौहार्द्र बना रहता है। भिन्नता और मतभेद नहीं बढ़ते।
4. सामूहिक शक्ति:
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
जब सब मिलकर चलते हैं तो दूसरों को तारने (उद्धार करने) की शक्ति आती है। अकेला व्यक्ति खुद तो तर सकता है लेकिन दूसरों को नहीं तार सकता।
5. लक्ष्य प्राप्ति: एक ही मार्ग के सभी यात्री सावधान होकर चलें तो गंतव्य तक आसानी से पहुँच जाते हैं।
6. सामाजिक कल्याण: समाज का विकास तभी संभव है जब सभी लोग मिलकर एक-दूसरे का सहयोग करें। अलग-अलग रहने से समाज कमजोर हो जाता है।
7. स्वार्थ से ऊपर उठना:
ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति के काम से दूसरे का काम न चले। सभी को मिलकर रहना चाहिए।
इस कविता के आधार पर व्यक्ति को निम्नलिखित प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए:
1. परोपकारी जीवन: केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित के लिए जीना चाहिए। पशु-प्रवृत्ति से ऊपर उठकर मनुष्यता का परिचय देना चाहिए।
2. त्याग और बलिदान: दधीचि, कर्ण, रंतिदेव आदि की तरह दूसरों के लिए त्याग और बलिदान करने को तैयार रहना चाहिए।
3. निरहंकारी जीवन: धन-संपत्ति का घमंड नहीं करना चाहिए। विनम्र और सरल जीवन जीना चाहिए।
4. सहानुभूतिपूर्ण:
दूसरों के दुख-सुख में सहानुभूति दिखानी चाहिए। यही सबसे बड़ी संपत्ति है।
5. सार्वभौमिक बंधुत्व: सभी मनुष्यों को अपना बंधु समझना चाहिए। जाति, धर्म, देश की सीमाओं से ऊपर उठना चाहिए।
6. एकता और सहयोग: सबके साथ मिलकर चलना चाहिए। परस्पर सहयोग से ही प्रगति संभव है।
7. मृत्यु से न डरना: मृत्यु तो सभी को आनी है, इसलिए ऐसा जीवन जीना चाहिए कि मृत्यु के बाद भी लोग याद रखें।
8. नश्वरता का बोध: शरीर नश्वर है, इसलिए भौतिक वस्तुओं में आसक्त नहीं होना चाहिए।
9. आध्यात्मिक जीवन: ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि वही सबका रक्षक है।
10. दयालु और करुणामय: बुद्ध की तरह दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।
11. आशावादी और साहसी: विपत्तियों को हँसते-खेलते ढकेलते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।
12. अखंड आत्म-भाव: संपूर्ण विश्व को अपना मानने की भावना रखनी चाहिए।
‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त निम्नलिखित संदेश देना चाहते हैं:
1. सच्ची मनुष्यता का संदेश:
सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जीए और मरे। केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है।
2. परोपकार का महत्व: जीवन का उद्देश्य परोपकार होना चाहिए। दूसरों की सेवा में ही जीवन की सार्थकता है।
3. त्याग और बलिदान: महान व्यक्तियों की तरह हमें भी दूसरों के लिए त्याग करने को तैयार रहना चाहिए।
4. सार्वभौमिक बंधुत्व: सभी मनुष्य एक-दूसरे के बंधु हैं। जाति, धर्म, देश की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करनी चाहिए।
5. सहानुभूति और करुणा: दूसरों के दुख-दर्द में सहानुभूति दिखाना सबसे बड़ा गुण है।
6. एकता और सहयोग: एक-दूसरे का सहारा लेकर सामूहिक रूप से आगे बढ़ना चाहिए।
7. निरहंकारिता: धन-संपत्ति का घमंड नहीं करना चाहिए। विनम्र जीवन जीना चाहिए।
8. नश्वरता का ज्ञान: शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है। इसलिए भौतिक वस्तुओं में आसक्ति व्यर्थ है।
9. यादगार जीवन: ऐसा जीवन जीना चाहिए जो मृत्यु के बाद भी याद रहे।
10. मानवीय मूल्य: दया, करुणा, क्षमा, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए।
11. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: सभी की आत्मा एक परमात्मा का अंश है, इसलिए सबमें समान भाव रखना चाहिए।
12. सामाजिक उत्थान: व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए।
भावार्थ:
सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही:
मनुष्य को दूसरों के दुख-दर्द में सहानुभूति दिखानी चाहिए। यही सबसे बड़ी संपत्ति (महाविभूति) है। धन-दौलत से बड़ी संपत्ति है सहानुभूति और करुणा का भाव।
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही:
पृथ्वी (मही) सदैव से वशीकृत (वश में की हुई) बनी हुई है। अर्थात् पृथ्वी सदा से सबकी सेवा करती आई है। वह सभी प्राणियों को आश्रय देती है, सबका भार वहन करती है। यह उसका स्वभाव है।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा:
गौतम बुद्ध ने अपने समय की पारंपरिक मान्यताओं और कर्मकांडों का विरोध किया था। लेकिन उनका यह विरोध दया और करुणा की धारा में बह गया। उन्होंने क्रोध से नहीं, बल्कि दया और करुणा से विरोध किया।
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?:
उनकी इस दया और करुणा के कारण विनम्र लोगों का समूह उनके सामने झुका रहा। सभी लोग उनके अनुयायी बन गए। उनकी करुणा ने सबको जीत लिया।
भावार्थ:
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में:
कवि कहते हैं कि भूलकर भी तुच्छ (छोटी-सी) धन-संपत्ति के मद में अंधे नहीं होना चाहिए। धन का घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि यह नश्वर है और बहुत छोटी चीज है।
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में:
अपने को सनाथ (किसी का आश्रय प्राप्त) समझकर मन में गर्व नहीं करना चाहिए। यह सोचकर कि मेरे पास धन है, सहारा है, इसलिए मैं बड़ा हूँ – ऐसा अहंकार नहीं करना चाहिए।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं:
इस संसार में कोई अनाथ नहीं है क्योंकि त्रिलोकनाथ (तीनों लोकों के स्वामी) ईश्वर सभी के साथ हैं। परमात्मा सबका रक्षक है।
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं:
दयालु ईश्वर दीनों (गरीबों, असहायों) के बंधु हैं और उनके हाथ बहुत विशाल हैं। वे सभी की रक्षा करने में समर्थ हैं। कोई भी उनकी पहुँच से बाहर नहीं है।
भावार्थ:
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए:
अपने इच्छित (अभीष्ट) लक्ष्य की ओर खुशी-खुशी (सहर्ष) खेलते हुए चलना चाहिए। जीवन-पथ पर प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। जीवन को एक खेल की तरह जीना चाहिए, बोझ नहीं समझना चाहिए।
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए:
रास्ते में जो भी विपत्तियाँ या बाधाएँ आएँ, उन्हें साहसपूर्वक ढकेलते हुए (दूर करते हुए) आगे बढ़ते रहना चाहिए। मुश्किलों से घबराना नहीं चाहिए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी:
आपस में मेल-मिलाप कम नहीं होना चाहिए और भिन्नता (मतभेद) कभी नहीं बढ़नी चाहिए। सबको प्रेम और एकता के साथ रहना चाहिए।
तवर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी:
एक ही मार्ग (पंथ) के सभी यात्री सावधान (सतर्क) होकर चलें। तवर्क का अर्थ है – तर्क से परे, अर्थात् बिना किसी संदेह के। सभी को एक लक्ष्य की ओर सावधानीपूर्वक बढ़ना चाहिए।
🌟 कविता के मुख्य बिंदु:
- केंद्रीय भाव: सच्ची मनुष्यता परोपकार और त्याग में है
- भाषा: विशुद्ध खड़ी बोली, संस्कृत शब्दों का प्रयोग
- छंद: तुकांत छंद, लयात्मक
- अलंकार: अनुप्रास, उदाहरण, प्रतीक
- उदाहरण: रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण, बुद्ध
- मुख्य संदेश: मनुष्य मात्र बंधु है, परोपकार ही धर्म है
याद रखने योग्य पंक्तियाँ:
- “वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे” – कविता की मुख्य पंक्ति
- “सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही”
- “मनुष्य मात्र बंधु है यही बड़ा विवेक है”
- “वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे”
- ऐतिहासिक उदाहरण: रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण याद रखें
