Class 10 Hindi Chapter 3 NCERT Solutions And Important MCQ | Manushyata Class 10 Hindi

कक्षा 10 हिंदी – मनुष्यता – NCERT Solutions

📚 मैथिलीशरण गुप्त के बारे में

जन्म: 1886, चिरगाँव, झाँसी

जीवनकाल: 1886-1964

उपाधि: राष्ट्रकवि

भाषा ज्ञान: संस्कृत, बांग्ला, मराठी और अंग्रेजी

प्रमुख कृतियाँ: साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध

विशेषता: रामभक्त कवि, खड़ी बोली के प्रसिद्ध कवि, भारतीय इतिहास और संस्कृति के चितेरे

(क) प्रश्नों के उत्तर
1 कवि ने कैसी मृत्यु को सुमृत्यु कहा है?
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।

कवि ने उस मृत्यु को सुमृत्यु (अच्छी मृत्यु) कहा है जो निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त हो:

1. यादगार मृत्यु: ऐसी मृत्यु जिसे सभी लोग याद रखें। जब व्यक्ति दूसरों के हित के लिए अपना जीवन समर्पित करके मरे।

2. परोपकारी जीवन के बाद:

हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।

जो व्यक्ति केवल अपने लिए जीता है और अपने लिए ही मरता है, उसकी मृत्यु व्यर्थ है। सुमृत्यु वह है जो दूसरों के लिए जीने और मरने के बाद हो।

3. मनुष्य के लिए मरना:

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

4. त्याग और बलिदान: जिस प्रकार रंतिदेव, दधीचि, उशीनर और कर्ण ने दूसरों के हित के लिए अपना सर्वस्व त्याग दिया, वैसी मृत्यु सुमृत्यु है।

निष्कर्ष: सुमृत्यु वह है जिसमें व्यक्ति परोपकार, त्याग और मानवता की सेवा करते हुए मरे और युगों तक लोगों की स्मृति में जीवित रहे।
2 उदार व्यक्ति की पहचान कैसे हो सकती है?

उदार व्यक्ति की पहचान निम्नलिखित गुणों से होती है:

1. सरस्वती का गुणगान:

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती।

ज्ञान की देवी सरस्वती उसी उदार व्यक्ति की कथा का वर्णन करती हैं।

2. धरती का आभार:

उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।

पृथ्वी स्वयं को धन्य मानती है कि उस पर ऐसे उदार व्यक्ति का जन्म हुआ।

3. जीवित कीर्ति:

उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती।

उसका यश सदैव जीवित रहता है और मधुर ध्वनि करता है।

4. सृष्टि का सम्मान:

तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।

संपूर्ण सृष्टि उस उदार व्यक्ति की पूजा करती है।

5. अखंड आत्म भाव:

अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

जिसमें संपूर्ण विश्व के प्रति एकात्मकता का भाव हो, जो सभी को अपना समझे।

6. परोपकार: जो दूसरों के हित के लिए सर्वस्व त्याग कर दे।

सारांश: उदार व्यक्ति वह है जो परोपकारी हो, जिसका जीवन दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित हो, और जो युगों तक याद रखा जाए।
3 कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर ‘मनुष्यता’ के लिए क्या संदेश दिया है?

कवि ने दधीचि, कर्ण आदि महान व्यक्तियों के उदाहरण देकर निम्नलिखित संदेश दिया है:

क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।

महान व्यक्तियों के उदाहरण:

1. रंतिदेव: अत्यंत भूखे होने पर भी अपने हाथ में पकड़ा हुआ थाल (भोजन) किसी याचक को दे दिया।

2. दधीचि ऋषि: देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियाँ दान कर दीं, जिनसे इंद्र का वज्र बनाया गया।

3. उशीनर (राजा शिबि): कबूतर की रक्षा के लिए अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया।

4. कर्ण: दान के लिए प्रसिद्ध, अपने शरीर का कवच-कुंडल तक दान कर दिया।

संदेश:

  • शरीर नश्वर है: यह नश्वर शरीर किसी दिन नष्ट हो ही जाएगा, इसलिए इसे परोपकार में लगाना चाहिए।
  • आत्मा अमर है: अनित्य देह के लिए अनादि जीव (आत्मा) को क्या डरना?
  • त्याग और बलिदान: सच्ची मनुष्यता इसी में है कि हम दूसरों के लिए त्याग और बलिदान करें।
  • परोपकार सर्वोपरि: अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई करना ही मनुष्यता है।
  • अमर यश: ऐसे त्याग से व्यक्ति युगों-युगों तक अमर हो जाता है।
मुख्य संदेश: मनुष्य को केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित के लिए जीना और मरना चाहिए। सच्ची मनुष्यता त्याग, बलिदान और परोपकार में निहित है।
4 कवि ने किन पंक्तियों में यह व्यक्त किया है कि हमें गर्व-रहित जीवन व्यतीत करना चाहिए?

कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में गर्व-रहित जीवन व्यतीत करने का संदेश दिया है:

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।

भावार्थ:

1. धन का घमंड नहीं करना: भूलकर भी तुच्छ धन-संपत्ति के मद में अंधे नहीं होना चाहिए। धन नश्वर है और इस पर गर्व करना मूर्खता है।

2. अपने को सनाथ जानकर गर्व न करें: अपने आप को किसी का आश्रय पाया हुआ या किसी के सहारे वाला समझकर मन में घमंड नहीं करना चाहिए।

3. ईश्वर सबके साथ है: इस संसार में कोई अनाथ नहीं है क्योंकि त्रिलोकनाथ (तीनों लोकों के स्वामी) ईश्वर सभी के साथ हैं।

4. दीनबंधु के विशाल हाथ: दयालु ईश्वर दीनों के बंधु हैं और उनके हाथ बहुत विशाल हैं। वे सभी की रक्षा करते हैं।

संदेश: कवि कहना चाहते हैं कि मनुष्य को धन-संपत्ति या किसी सांसारिक आश्रय पर गर्व नहीं करना चाहिए। सच्चा सहारा तो परमात्मा है जो सभी का रक्षक है। विनम्रता और निरहंकारिता ही सच्ची मनुष्यता है।
5 ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए।
‘मनुष्य मात्र बंधु है’ यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।

‘मनुष्य मात्र बंधु है’ का अर्थ:

1. सार्वभौमिक बंधुत्व: प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य का भाई/बंधु है। सभी मनुष्य परस्पर भाई-भाई हैं। जाति, धर्म, रंग, देश की सीमाओं से परे सभी मनुष्य एक हैं।

2. एक ही पिता की संतान:

  • पुराणपुरुष (प्राचीन पुरुष) परमात्मा ही सबका पिता है
  • स्वयंभू (स्वयं उत्पन्न) ईश्वर सभी का जनक है
  • जब सभी का पिता एक है तो सभी मनुष्य भाई-भाई हुए

3. बाहरी भेद, आंतरिक एकता:

फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं,
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
  • कर्मों के अनुसार बाहरी भेद हो सकते हैं (अमीर-गरीब, राजा-रंक)
  • लेकिन आत्मा की एकता में सभी समान हैं
  • वेद इस बात के प्रमाण हैं कि सभी की आत्मा एक ही परमात्मा का अंश है

4. बंधु की व्यथा हरना:

अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे।

यह अनुचित है कि बंधु अपने बंधु की पीड़ा को दूर न करे। मनुष्य को मनुष्य का दुख-दर्द दूर करना चाहिए।

निष्कर्ष: ‘मनुष्य मात्र बंधु है’ का अर्थ है कि सभी मनुष्य परस्पर भाई हैं। यह सबसे बड़ा विवेक है। जाति, धर्म, देश से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता को एक परिवार मानना चाहिए। यह वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।
6 कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा क्यों दी है?
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
तवर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा निम्नलिखित कारणों से दी है:

1. विपत्तियों का सामना: जब सभी लोग एकजुट होकर चलते हैं तो विपत्तियाँ और विघ्न आसानी से दूर हो जाते हैं। अकेला व्यक्ति कमजोर होता है, लेकिन संगठन में शक्ति है।

2. प्रगति और विकास:

परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी,
अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।

एक-दूसरे का सहारा लेकर सभी को आगे बढ़ना चाहिए और देवताओं की गोद में कलंक-रहित होकर पहुँचना चाहिए।

3. मेल-मिलाप बनाए रखना: एकता में रहने से आपसी प्रेम और सौहार्द्र बना रहता है। भिन्नता और मतभेद नहीं बढ़ते।

4. सामूहिक शक्ति:

तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

जब सब मिलकर चलते हैं तो दूसरों को तारने (उद्धार करने) की शक्ति आती है। अकेला व्यक्ति खुद तो तर सकता है लेकिन दूसरों को नहीं तार सकता।

5. लक्ष्य प्राप्ति: एक ही मार्ग के सभी यात्री सावधान होकर चलें तो गंतव्य तक आसानी से पहुँच जाते हैं।

6. सामाजिक कल्याण: समाज का विकास तभी संभव है जब सभी लोग मिलकर एक-दूसरे का सहयोग करें। अलग-अलग रहने से समाज कमजोर हो जाता है।

7. स्वार्थ से ऊपर उठना:

रहो न यों कि एक से न काम और का सरे।

ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति के काम से दूसरे का काम न चले। सभी को मिलकर रहना चाहिए।

निष्कर्ष: कवि एकता, सहयोग और सामूहिक प्रगति का संदेश देते हैं। एक होकर चलने से ही समाज मजबूत बनता है, विपत्तियों का सामना होता है और सच्ची मनुष्यता का विकास होता है।
7 व्यक्ति को किस प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए? इस कविता के आधार पर लिखिए।

इस कविता के आधार पर व्यक्ति को निम्नलिखित प्रकार का जीवन व्यतीत करना चाहिए:

1. परोपकारी जीवन: केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित के लिए जीना चाहिए। पशु-प्रवृत्ति से ऊपर उठकर मनुष्यता का परिचय देना चाहिए।

2. त्याग और बलिदान: दधीचि, कर्ण, रंतिदेव आदि की तरह दूसरों के लिए त्याग और बलिदान करने को तैयार रहना चाहिए।

3. निरहंकारी जीवन: धन-संपत्ति का घमंड नहीं करना चाहिए। विनम्र और सरल जीवन जीना चाहिए।

4. सहानुभूतिपूर्ण:

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही।

दूसरों के दुख-सुख में सहानुभूति दिखानी चाहिए। यही सबसे बड़ी संपत्ति है।

5. सार्वभौमिक बंधुत्व: सभी मनुष्यों को अपना बंधु समझना चाहिए। जाति, धर्म, देश की सीमाओं से ऊपर उठना चाहिए।

6. एकता और सहयोग: सबके साथ मिलकर चलना चाहिए। परस्पर सहयोग से ही प्रगति संभव है।

7. मृत्यु से न डरना: मृत्यु तो सभी को आनी है, इसलिए ऐसा जीवन जीना चाहिए कि मृत्यु के बाद भी लोग याद रखें।

8. नश्वरता का बोध: शरीर नश्वर है, इसलिए भौतिक वस्तुओं में आसक्त नहीं होना चाहिए।

9. आध्यात्मिक जीवन: ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि वही सबका रक्षक है।

10. दयालु और करुणामय: बुद्ध की तरह दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।

11. आशावादी और साहसी: विपत्तियों को हँसते-खेलते ढकेलते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।

12. अखंड आत्म-भाव: संपूर्ण विश्व को अपना मानने की भावना रखनी चाहिए।

सारांश: व्यक्ति को परोपकारी, त्यागमय, निरहंकारी, सहानुभूतिपूर्ण और एकतापूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए जिससे वह सच्ची मनुष्यता को प्राप्त कर सके।
8 ‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहता है?

‘मनुष्यता’ कविता के माध्यम से कवि मैथिलीशरण गुप्त निम्नलिखित संदेश देना चाहते हैं:

1. सच्ची मनुष्यता का संदेश:

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जीए और मरे। केवल अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है।

2. परोपकार का महत्व: जीवन का उद्देश्य परोपकार होना चाहिए। दूसरों की सेवा में ही जीवन की सार्थकता है।

3. त्याग और बलिदान: महान व्यक्तियों की तरह हमें भी दूसरों के लिए त्याग करने को तैयार रहना चाहिए।

4. सार्वभौमिक बंधुत्व: सभी मनुष्य एक-दूसरे के बंधु हैं। जाति, धर्म, देश की सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करनी चाहिए।

5. सहानुभूति और करुणा: दूसरों के दुख-दर्द में सहानुभूति दिखाना सबसे बड़ा गुण है।

6. एकता और सहयोग: एक-दूसरे का सहारा लेकर सामूहिक रूप से आगे बढ़ना चाहिए।

7. निरहंकारिता: धन-संपत्ति का घमंड नहीं करना चाहिए। विनम्र जीवन जीना चाहिए।

8. नश्वरता का ज्ञान: शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है। इसलिए भौतिक वस्तुओं में आसक्ति व्यर्थ है।

9. यादगार जीवन: ऐसा जीवन जीना चाहिए जो मृत्यु के बाद भी याद रहे।

10. मानवीय मूल्य: दया, करुणा, क्षमा, त्याग जैसे मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए।

11. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: सभी की आत्मा एक परमात्मा का अंश है, इसलिए सबमें समान भाव रखना चाहिए।

12. सामाजिक उत्थान: व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए।

मुख्य संदेश: कवि का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को पशु-प्रवृत्ति से ऊपर उठकर मानवता के गुणों को अपनाना चाहिए। परोपकार, त्याग, सहानुभूति और सार्वभौमिक बंधुत्व ही सच्ची मनुष्यता है। जीवन का उद्देश्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए होना चाहिए।
(ख) भाव स्पष्ट कीजिए
1 सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही। वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही। विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा, विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?

भावार्थ:

सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही:

मनुष्य को दूसरों के दुख-दर्द में सहानुभूति दिखानी चाहिए। यही सबसे बड़ी संपत्ति (महाविभूति) है। धन-दौलत से बड़ी संपत्ति है सहानुभूति और करुणा का भाव।

वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही:

पृथ्वी (मही) सदैव से वशीकृत (वश में की हुई) बनी हुई है। अर्थात् पृथ्वी सदा से सबकी सेवा करती आई है। वह सभी प्राणियों को आश्रय देती है, सबका भार वहन करती है। यह उसका स्वभाव है।

विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा:

गौतम बुद्ध ने अपने समय की पारंपरिक मान्यताओं और कर्मकांडों का विरोध किया था। लेकिन उनका यह विरोध दया और करुणा की धारा में बह गया। उन्होंने क्रोध से नहीं, बल्कि दया और करुणा से विरोध किया।

विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?:

उनकी इस दया और करुणा के कारण विनम्र लोगों का समूह उनके सामने झुका रहा। सभी लोग उनके अनुयायी बन गए। उनकी करुणा ने सबको जीत लिया।

संदेश: कवि कहना चाहते हैं कि सहानुभूति और करुणा सबसे बड़ा गुण है। जिस व्यक्ति में दया और सहानुभूति होती है, वह सबका प्रिय बन जाता है। बुद्ध का उदाहरण देकर कवि बताते हैं कि दया और करुणा से पूरी दुनिया को जीता जा सकता है। यही सच्ची मनुष्यता है।
2 रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में। अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं, दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।

भावार्थ:

रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में:

कवि कहते हैं कि भूलकर भी तुच्छ (छोटी-सी) धन-संपत्ति के मद में अंधे नहीं होना चाहिए। धन का घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि यह नश्वर है और बहुत छोटी चीज है।

सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में:

अपने को सनाथ (किसी का आश्रय प्राप्त) समझकर मन में गर्व नहीं करना चाहिए। यह सोचकर कि मेरे पास धन है, सहारा है, इसलिए मैं बड़ा हूँ – ऐसा अहंकार नहीं करना चाहिए।

अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं:

इस संसार में कोई अनाथ नहीं है क्योंकि त्रिलोकनाथ (तीनों लोकों के स्वामी) ईश्वर सभी के साथ हैं। परमात्मा सबका रक्षक है।

दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं:

दयालु ईश्वर दीनों (गरीबों, असहायों) के बंधु हैं और उनके हाथ बहुत विशाल हैं। वे सभी की रक्षा करने में समर्थ हैं। कोई भी उनकी पहुँच से बाहर नहीं है।

संदेश: कवि का संदेश है कि मनुष्य को धन-संपत्ति या किसी सांसारिक आधार पर घमंड नहीं करना चाहिए। सच्चा सहारा तो परमात्मा है जो सबका पालनहार है। उसकी कृपा से कोई अनाथ नहीं है। इसलिए विनम्र और निरहंकारी बने रहना चाहिए। अहंकार मनुष्यता के विपरीत है।
3 चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए। घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी, तवर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।

भावार्थ:

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए:

अपने इच्छित (अभीष्ट) लक्ष्य की ओर खुशी-खुशी (सहर्ष) खेलते हुए चलना चाहिए। जीवन-पथ पर प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। जीवन को एक खेल की तरह जीना चाहिए, बोझ नहीं समझना चाहिए।

विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए:

रास्ते में जो भी विपत्तियाँ या बाधाएँ आएँ, उन्हें साहसपूर्वक ढकेलते हुए (दूर करते हुए) आगे बढ़ते रहना चाहिए। मुश्किलों से घबराना नहीं चाहिए।

घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी:

आपस में मेल-मिलाप कम नहीं होना चाहिए और भिन्नता (मतभेद) कभी नहीं बढ़नी चाहिए। सबको प्रेम और एकता के साथ रहना चाहिए।

तवर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी:

एक ही मार्ग (पंथ) के सभी यात्री सावधान (सतर्क) होकर चलें। तवर्क का अर्थ है – तर्क से परे, अर्थात् बिना किसी संदेह के। सभी को एक लक्ष्य की ओर सावधानीपूर्वक बढ़ना चाहिए।

संदेश: कवि एकता, सहयोग और सामूहिक प्रगति का संदेश दे रहे हैं। जीवन-पथ पर सभी को मिलकर प्रसन्नतापूर्वक चलना चाहिए। विपत्तियों से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें साहस से पार करना चाहिए। आपसी मेल-मिलाप बनाए रखना चाहिए और मतभेद नहीं बढ़ाने चाहिए। एकता में ही शक्ति है। सबको मिलकर एक लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।

🌟 कविता के मुख्य बिंदु:

  • केंद्रीय भाव: सच्ची मनुष्यता परोपकार और त्याग में है
  • भाषा: विशुद्ध खड़ी बोली, संस्कृत शब्दों का प्रयोग
  • छंद: तुकांत छंद, लयात्मक
  • अलंकार: अनुप्रास, उदाहरण, प्रतीक
  • उदाहरण: रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण, बुद्ध
  • मुख्य संदेश: मनुष्य मात्र बंधु है, परोपकार ही धर्म है
📌 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण

याद रखने योग्य पंक्तियाँ:

  • “वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे” – कविता की मुख्य पंक्ति
  • “सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही”
  • “मनुष्य मात्र बंधु है यही बड़ा विवेक है”
  • “वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे”
  • ऐतिहासिक उदाहरण: रंतिदेव, दधीचि, उशीनर, कर्ण याद रखें

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