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Class 10 Hindi Chapter 7 Atmatran Question Answer (NCERT Solutions)

Class 10 Hindi Chapter 7 Atmatran Question Answer | NCERT Solutions

Class 10 Hindi Chapter 7 Atmatran Question Answer (NCERT Solutions)

Welcome to The Social Class. In this post, we provide comprehensive NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 7. The poem “Atmatran” (आत्मत्राण) is written by the Nobel laureate Rabindranath Tagore (translated from Bengali to Hindi). Unlike traditional prayers, this poem does not ask God to remove sorrows but asks for the strength to bear them.

NCERT Textbook Questions (Prashn-Abhyas)

प्रश्न 1. कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?

उत्तर: कवि अपने आराध्य (ईश्वर) से प्रार्थना कर रहा है कि वे उसे विपत्तियों (मुसीबतों) से बचाएं नहीं, बल्कि उन विपत्तियों का सामना करने की शक्ति दें। कवि यह नहीं चाहता कि ईश्वर उसके दुख दूर करें, बल्कि वह चाहता है कि उन दुखों को सहने और उनसे जीतने का आत्मबल उसे प्राप्त हो।

प्रश्न 2. ‘विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं’ – कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?

उत्तर: इस पंक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि वह ईश्वर से सुरक्षा की भीख नहीं मांगना चाहता। वह यह नहीं चाहता कि उसके जीवन में कोई मुसीबत ही न आए। वह चाहता है कि जब मुसीबतें आएं, तो वह उनसे डरे नहीं। उसका मन निर्भय रहे ताकि वह स्वयं संघर्ष करके उन पर विजय प्राप्त कर सके।

प्रश्न 3. कवि सहायक न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?

उत्तर: कवि प्रार्थना करता है कि यदि उसे जीवन में कोई सहायक (मददगार) न मिले, तब भी उसका अपना पौरुष (आत्मबल और हिम्मत) कमज़ोर न हो। वह अकेला ही हर कठिनाई का सामना कर सके। उसे किसी के सहारे की ज़रूरत न पड़े।

प्रश्न 4. अंत में कवि क्या अनुनय करता है?

उत्तर: अंत में कवि ईश्वर से यह अनुनय (विनती) करता है कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, सुख हो या दुख, वह ईश्वर को कभी न भूले।
1. सुख में: वह नतमस्तक होकर हर पल ईश्वर को याद रखे।
2. दुख में: यदि पूरी दुनिया उसे धोखा दे और दुख दे, तब भी उसके मन में ईश्वर के प्रति कोई संदेह (शक) पैदा न हो। उसकी आस्था बनी रहे।

प्रश्न 5. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: ‘आत्मत्राण’ का अर्थ है – ‘स्वयं की रक्षा’। आमतौर पर प्रार्थना गीतों में भक्त ईश्वर से अपनी रक्षा की गुहार लगाता है। लेकिन इस कविता में कवि ईश्वर से रक्षा नहीं चाहता, बल्कि वह ‘आत्मत्राण’ (अपनी रक्षा स्वयं) करने की शक्ति मांगता है। वह परजीवी या आश्रित नहीं बनना चाहता। इसलिए यह शीर्षक कविता के मूल भाव के अनुसार पूरी तरह सार्थक और सटीक है।

प्रश्न 6. अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं?

उत्तर: अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए हम प्रार्थना के अतिरिक्त निम्नलिखित प्रयास करते हैं:

  • कठिन परिश्रम और निरंतर अभ्यास करते हैं।
  • योजनाबद्ध तरीके से (Planning के साथ) कार्य करते हैं।
  • असफलता मिलने पर निराश होने के बजाय अपनी कमियों को सुधारते हैं।
  • आत्मविश्वास बनाए रखते हैं और धैर्य से काम लेते हैं।

प्रश्न 7. क्या कवि की यह प्रार्थना अन्य प्रार्थना गीतों से अलग है? यदि हाँ, तो कैसे?

उत्तर: हाँ, यह प्रार्थना अन्य गीतों से बिल्कुल अलग है।

  • अन्य प्रार्थनाओं में भक्त ईश्वर से दुख दूर करने, पाप काटने और सुख-समृद्धि देने की मांग करता है। वह ईश्वर को ही अपना एकमात्र सहारा मानकर उन पर निर्भर हो जाता है।
  • इसके विपरीत, ‘आत्मत्राण’ में कवि दुख दूर करने की नहीं, बल्कि दुख सहने की शक्ति मांगता है। वह ईश्वर से ‘बोझ हल्का करने’ की नहीं, बल्कि ‘बोझ उठाने की ताकत’ मांगता है। यह प्रार्थना मनुष्य को स्वावलंबी और साहसी बनाती है।

भाव स्पष्ट कीजिए

1. नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।

भाव: कवि कहते हैं कि सुख के दिनों में अक्सर मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है। इसलिए वे प्रार्थना करते हैं कि सुख के समय भी वे अहंकार में न डूबें। वे विनम्र होकर (सिर झुकाकर) हर पल ईश्वर की सत्ता को पहचानें और उन्हें याद रखें।

2. हानि उठानी पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय।

भाव: कवि कहते हैं कि यदि जीवन के संघर्ष में उन्हें केवल हानि ही उठानी पड़े और लाभ के नाम पर केवल धोखा (वंचना) ही मिले, तब भी वे मन से हार न मानें। उनका मनोबल कमज़ोर (क्षय) न हो और वे निराशा के गर्त में न गिरें।

3. तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।

भाव: कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें जीवन रूपी सागर को पार करने (तरने) की रोगरहित (अनामय) शक्ति दें। वे यह नहीं चाहते कि ईश्वर उनकी जिम्मेदारियों का बोझ कम (लघु) कर दें या उन्हें झूठी तसल्ली (सांत्वना) दें। वे बस इतनी शक्ति चाहते हैं कि वे अपनी जिम्मेदारियों का बोझ स्वयं उठा सकें।

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