Class 10 Hindi Chapter 3 Manushyata Question Answer (NCERT Solutions)
Class 10 Hindi Chapter 3 Manushyata Question Answer (NCERT Solutions)
Welcome to The Social Class. In this post, we provide comprehensive NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 3. The poem “Manushyata” (मनुष्यता) by the national poet Maithili Sharan Gupt teaches us that a true human being is one who lives and dies for the betterment of others.
Read Previous Chapters:
- Chapter 2: Meera Ke Pad Question Answer
NCERT Textbook Questions (Prashn-Abhyas)
उत्तर: कवि ने उस मृत्यु को ‘सुमृत्यु’ (अच्छी मृत्यु) कहा है, जिसके बाद लोग मरने वाले को याद रखें। यदि कोई मनुष्य अपने जीवन में दूसरों की भलाई नहीं करता और केवल अपने लिए जीता है, तो उसका मरना और जीना दोनों व्यर्थ है। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए अपने प्राण त्याग दे।
उत्तर: उदार व्यक्ति की पहचान इस प्रकार होती है:
- उसकी कथा का बखान स्वयं सरस्वती (साहित्य/इतिहास) करती है।
- धरती ऐसे व्यक्ति का आभार मानती है।
- उसकी कीर्ति (यश) सदा-सदा के लिए गूंजती रहती है और समस्त सृष्टि उसे पूजती है।
- उदार व्यक्ति वह है जो पूरे विश्व में अखंड आत्मभाव (अपनापन) भरता है।
उत्तर: कवि ने पौराणिक नायकों का उदाहरण देकर त्याग और बलिदान का संदेश दिया है:
- रंतिदेव: भूख से व्याकुल होते हुए भी अपना भोजन (थाल) दान कर दिया।
- दधीचि: देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियाँ (अस्थिजाल) दान कर दीं।
- उशीनर (राजा शिवि): कबूतर की रक्षा के लिए अपना मांस दे दिया।
- कर्ण: खुशी-खुशी अपने शरीर का कवच (शरीर-चर्म) दान कर दिया।
इन उदाहरणों से कवि बताना चाहते हैं कि यह शरीर नश्वर (अनित्य) है, इसलिए परोपकार के लिए इसका त्याग करने से डरना नहीं चाहिए।
उत्तर: कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में गर्व रहित जीवन जीने की प्रेरणा दी है:
“रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।”
अर्थात, धन-संपत्ति की प्राप्ति होने पर घमंड में अंधे नहीं होना चाहिए और न ही खुद को सनाथ (शक्तिशाली) मानकर गर्व करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर सबके साथ हैं।
उत्तर: इसका अर्थ है कि संसार के सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई हैं। हम सबका पिता एक ही है—वह परमपिता परमात्मा (स्वयंभू)। भले ही हमारे कर्मों के अनुसार हमारे बाहरी रूप और जीवन में अंतर (भेद) हो, लेकिन आंतरिक रूप से हम सब एक हैं (वेद भी यही प्रमाण देते हैं)। इसलिए सबसे बड़ा विवेक यही है कि हम सबको अपना बंधु मानें।
उत्तर: कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा इसलिए दी है ताकि हम एक-दूसरे का सहारा (परस्परावलंब) बनकर आगे बढ़ सकें। जब हम साथ चलेंगे, तो आपसी मेलजोल बढ़ेगा और भिन्नता कम होगी। इससे हम सभी बाधाओं को पार करते हुए उस परमपिता परमात्मा की गोद (अमर्त्य-अंक) में कलंक रहित होकर प्रवेश कर सकेंगे।
उत्तर: इस कविता के आधार पर व्यक्ति को ऐसा जीवन व्यतीत करना चाहिए:
- जो परोपकार और त्याग से भरा हो।
- जिसमें अभिमान और अहंकार के लिए कोई जगह न हो।
- जो दूसरों के दुख-दर्द को अपना समझे और उसे दूर करने का प्रयास करे।
- जो सबको साथ लेकर चले और एकता बनाए रखे।
- जिसका उद्देश्य केवल अपना पेट भरना न हो, बल्कि दूसरों के लिए जीना हो।
उत्तर: कवि यह संदेश देना चाहता है कि सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए जीता और मरता है। हमें पशु-प्रवृत्ति (केवल अपने लिए जीना) को त्यागकर उदारता, सहानुभूति और विश्व-बंधुत्व की भावना को अपनाना चाहिए। धन के घमंड से दूर रहकर और आपसी भेदभाव भुलाकर हमें एक-दूसरे की सहायता करते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।
भाव स्पष्ट कीजिए
भाव: कवि कहते हैं कि मनुष्य के मन में दया और करुणा का भाव होना चाहिए, यही उसकी सबसे बड़ी पूँजी (महाविभूति) है। जिस व्यक्ति के पास सहानुभूति होती है, सारी पृथ्वी भी उसके वश में हो जाती है। महात्मा बुद्ध ने दया के वश होकर पुरानी परंपराओं का विरोध किया, फिर भी उनकी करुणा के कारण पूरी दुनिया उनके सामने नतमस्तक हुई। परोपकारी व्यक्ति ही सच्चा उदार और सच्चा मनुष्य है。
भाव: कवि चेतावनी देते हैं कि धन-संपत्ति (वित्त) बहुत तुच्छ चीज है, इसके नशे में अंधे होकर कभी घमंड नहीं करना चाहिए। यह सोचकर गर्व न करें कि आपके पास अपनों का साथ है (सनाथ), क्योंकि इस दुनिया में कोई भी अनाथ (बेसहारा) नहीं है। तीनों लोकों के स्वामी (ईश्वर) सबके साथ हैं और वे बहुत दयालु हैं, उनके हाथ सबकी मदद के लिए बहुत विशाल हैं。
भाव: कवि प्रेरित करते हैं कि हम अपने इच्छित लक्ष्य (अभीष्ट मार्ग) की ओर खुशी-खुशी (सहर्ष) आगे बढ़ें। रास्ते में जो भी मुसीबतें और बाधाएं आएं, उन्हें हटाते हुए चलें। लेकिन यह ध्यान रखें कि हमारा आपसी मेलजोल कम न हो और हमारे बीच दूरियां (भिन्नता) न बढ़ें। हम बिना किसी तर्क-वितर्क के, सावधानी से एक साथ आगे बढ़ें। सच्ची समर्थता (सफलता) उसी में है जब हम खुद तरते हुए दूसरों को भी तारें (उद्धार करें)।
