Class 11 Hindi Chapter 5 Galta Loha Question Answer (NCERT Solutions)
Welcome to The Social Class. In this post, we provide comprehensive NCERT Solutions for Class 11 Hindi Aroh Chapter 5. The chapter titled “Galta Loha” (गलता लोहा) is a significant story by Shekhar Joshi that explores themes of caste discrimination, the struggle of talent against poverty, and the dignity of labor.
Read Previous Chapters:
- Chapter 1: Namak Ka Daroga NCERT Solutions
- Chapter 2: Miya Nasiruddin NCERT Solutions
- Chapter 3: Appu Ke Saath Dhai Saal NCERT Solutions
- Chapter 4: Vidai Sambhashan NCERT Solutions
NCERT Textbook Questions (Paath ke Saath)
उत्तर: कहानी में यह प्रसंग तब आता है जब धनराम अपने बचपन की यादें ताज़ा करता है। स्कूल में मास्टर त्रिलोक सिंह उसे तेरह का पहाड़ा (किताबों की विद्या) याद करवाते थे, जो उसे याद नहीं होता था। इसके लिए उसे मार भी पड़ती थी।
दूसरी ओर, स्कूल से छूटते ही वह अपने पिता गंगाराम के साथ दुकान पर बैठ जाता था। वहाँ उसने ‘घन चलाने की विद्या’ सीखी। हथौड़े से लेकर घन चलाने, धौंकनी फूंकने और सान लगाने का काम उसने अपने पिता से सीखा। लेखक ने दिखाया है कि धनराम के लिए किताबों की विद्या (पढ़ाई) कठिन थी, लेकिन लोहार का काम (घन चलाना) उसने मेहनत से सीख लिया था।
उत्तर: धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी (Competitor) निम्नलिखित कारणों से नहीं समझता था:
- जातिगत हीनता: धनराम लोहार जाति का था और मोहन ऊँची जाति (ब्राह्मण) का था। बचपन से ही उसके मन में यह बात बैठा दी गई थी कि वे दोनों बराबर नहीं हो सकते।
- कक्षा में मोहन का स्थान: मोहन कक्षा का सबसे होशियार लड़का और मॉनीटर था। मास्टर जी भी कहते थे कि मोहन बड़ा आदमी बनेगा। धनराम इसे मोहन का अधिकार मानता था।
- स्नेह और आदर: धनराम के मन में मोहन के प्रति ईर्ष्या की जगह स्नेह और आदर का भाव था।
उत्तर: कहानी के अंत में धनराम को मोहन के उस व्यवहार पर बहुत आश्चर्य होता है जब मोहन उसकी भट्टी पर आकर बैठ जाता है और लोहे की एक छड़ को अपने हाथों से बहुत कुशलता से गोल आकार दे देता है।
आश्चर्य का कारण: ब्राह्मण टोले के लोग आमतौर पर शिल्पकार (लोहार) टोले में बैठते नहीं थे, और लोहे का काम करना तो दूर की बात थी। मोहन ने अपनी जाति की ‘मर्यादा’ और संकोच को छोड़कर, एक कारीगर की तरह काम किया। यह धनराम के लिए अकल्पनीय था।
उत्तर: लेखक ने लखनऊ आने को ‘नया अध्याय’ इसलिए कहा है क्योंकि यहाँ से मोहन के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई:
- मेधावी छात्र से नौकर: गाँव में वह एक होशियार छात्र था, लेकिन लखनऊ में रमेश के घर उसे एक घरेलू नौकर की तरह काम करना पड़ा।
- प्रतिभा का दमन: उसे पढ़ने के उचित अवसर नहीं मिले। उसे एक साधारण स्कूल में डाल दिया गया और घर के काम के बोझ ने उसकी प्रतिभा को कुचल दिया।
- सपनों का अंत: उसके पिता ने सोचा था कि वह बड़ा अफसर बनेगा, लेकिन लखनऊ में वह केवल एक तकनीकी स्कूल से डिप्लोमा लेकर बेरोजगार बनकर रह गया।
उत्तर: मास्टर त्रिलोक सिंह ने धनराम से कहा था- “तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है रे! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें?”
लेखक ने इसे ‘ज़बान का चाबुक’ इसलिए कहा है क्योंकि:
- शारीरिक मार (चमड़े का चाबुक) का दर्द थोड़ी देर में खत्म हो जाता है, लेकिन कड़वी बातों का घाव मन पर हमेशा रहता है।
- इस कथन ने धनराम को यह एहसास दिला दिया कि वह पढ़ने के लायक नहीं है और उसका काम सिर्फ लोहा पीटना ही है। इसने उसके आत्मविश्वास को तोड़ दिया।
(क) किसने किससे कहा?
यह वाक्य मोहन के पिता वंशीधर ने अपनी बिरादरी के युवक रमेश से कहा।
(ख) किस प्रसंग में कहा?
जब रमेश ने सहानुभूति दिखाते हुए मोहन को अपने साथ लखनऊ ले जाकर पढ़ाने का प्रस्ताव रखा, तब वंशीधर ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए यह कहा।
(ग) किस आशय से कहा?
उनका आशय था कि अपनी जाति और समाज के लोग ही मुसीबत में काम आते हैं और रमेश ने मोहन की जिम्मेदारी लेकर बड़ा उपकार किया है।
(घ) क्या कहानी में यह आशय स्पष्ट हुआ है?
नहीं, कहानी में यह आशय पूरी तरह उलट गया। रमेश ने ‘सहारा’ देने के बजाय मोहन का शोषण किया और उसे नौकर बना कर रख दिया। बिरादरी का सहारा मात्र एक दिखावा साबित हुआ।
(क) किसके लिए कहा गया है?
यह वाक्य मोहन के लिए कहा गया है।
(ख) किस प्रसंग में कहा गया है?
जब मोहन ने धनराम की भट्टी पर लोहे की छड़ को पीटकर एकदम सही गोलाकार (छल्ला) बना दिया और अपनी कारीगरी को संतोष से देखा।
(ग) यह पात्र-विशेष के किन चारित्रिक पहलुओं को उजागर करता है?
यह दर्शाता है कि मोहन जातिगत भेदभाव से ऊपर उठ चुका है। उसे काम छोटा या बड़ा नहीं लगता। उसके अंदर एक कलाकार (सर्जक) है जो सृजन (Creation) में खुशी पाता है, चाहे वह लोहे का काम ही क्यों न हो।
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